মানব সমাজ

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Author: Rahul Sankrityayan

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‘मानव-समाज’”वैज्ञानिक भौतिकवाद” कें परिवारकी दूसरी पुस्तक है । समाजका विकास किस तरह हुआ, इसके बारेमें साइंसके सहारे जिस निष्कर्षपर हम पहुँचते हैं, उसे यहाँ दिया गया है। मुझे जिन ग्रन्योंसे पुस्तक लिखने में सहायता मिली है, उनका नाम पुस्तकके अन्तमें दे दिया गया है। और भी पुस्तकोंके अवलोकनकी ज़रूरत थी ; किन्तु जिस परिस्थितिमें देवली-केम्प (जेल )में पुस्तक लिखी गयी, उसमें इसे भी गनीमत समझना चाहिये । और कोई ग्रन्थ अन्तिम भी नहीं हो सकता, हरएक ग्रंथका काम इतना ही है कि आगे आनेवालोंके कामको अगली सीढ़ियोंपर पहुँचने में सहायक हों ; मानव-समाज उतना काम तो ज़रूर कर सकेगा । मैं समझता हूँ, ऐसी पुस्तकोंकी उपयोगिता और बढ़ जाय, यदि वह अनेक ‘समानधर्मा’ लेखकोंके सहयोगसे लिखी जायें : किन्तु अभी हमारी भाषामे ऐसे विचारके आदमी कम मिलते हैं, और लोग ‘अपनी घानी अपना कोल्हू रखना चाहते हैं।पुस्तकके कितने ही अंगोंको मेरे मित्र बी० पी० एल० वेदनेि बड़े चावसे सुना था, और दूसरी परिस्थितियाँ बाधक न हुई होतों, तो वह सभी सुनते, उनके सुझावसे इस पुस्तकमें ज्यादा परिवर्तन नहीं किया जा सका ; किन्तु लेखकने अगली पुस्तकों में उसपर काफी ध्यान दिया है। पुस्तकके कितने ही अंशोंकी सायी बगेिने-मेरे ईश्वरके सँवारे अक्षरोंकी ज़हमत उठाकर भी-पढ़ा, और उनके मुझाव बहुत उपयोगी साबित हुए । भाषा की सरलता के बारेमें डाक्टर भगवानदासजी (काशी)पा वचन मुझे बहुत याद रहता है। वह लिखनेमें अपनी उसी हिन्दीकी ठीक समझते हैं, जिसे कि उनकी धर्मपत्नी समझ लेती है। मैं भी चाहता था, कि प्रत्येक अध्यायको सुननेवाला कोई केवल हिन्दी जाननेवाला (अंग्रेजी के एक शब्दसे भी अपरिचित ) श्रोता मिलता, और मैं उसकी दिक्कतोंको सुधारता जाता, तो पुस्तकमें भाषा-क्लिष्टता के दोष न आते; किन्तु वैसा कोई मिल न सका। हजारीबाग में आनेपर साथी नागेश्वरसेनने पुस्तकको पढ़ा ज़रूर, किन्तु उनकी सम्मतिसे सिर्फ आत्म-सन्तोष भर मै कर सकता था। इससे इतना तो ज़रूर पाठकोंकी विश्वास होना चाहिये, कि मैंने भाषाको सुगम करनेकी पूरी कोशिश की है। ‘विश्वकी रूपरेखा’ ‘मानव-समाज’ ‘दशन-दिग्दशन’ और ‘वैशानिक भौतिकवाद’ -चारों पुस्तकें मानव-जातिके आज तकके अर्जित-ज्ञानको संक्षेपमें देनेकी कोशिश कर रही हैं, किन्तु उनका शान सिर्फ विश्वको जानने के लिये नहीं है, बल्कि उसे ‘बदलनेके लिये” है। – राहुल साकृत्यायन